10 तथ्य जो आपको याद दिलाते रहेंगे कि आप शाकाहारी क्यों बने थे
पूर्ण शाकाहार एक खूबसूरत जीवनशैली है। शाकाहारियों की बदौलत हर दिन अनगिनत पशुओं, पर्यावरण के साथ-साथ उनके खुद के स्वास्थ्य की रक्षा भी होती है। अध्ययनों से पता चला है दया हमारे लिए वस्तुतः अच्छा है और पूर्ण शाकाहार का सीधा संबंध इसी से है। लेकिन हो सकता है कि लंबे समय तक शाकाहारी रहने के बाद शायाद आपको शाकाहार का उद्देश्य विस्मृत होने लगे।

मुझे गलत मत समझिए, मैं मांस, अंडा या दुग्ध उत्पाद खाने की कोई इच्छा नहीं रखता। मेरा शाकाहार सिर्फ़ इसलिए नहीं है कि यह पशुओं को पीड़ा से बचाता है बल्कि मुझे गैर-शाकाहार की जरूरत ही नहीं है। मेरे सभी प्रिय व्यंजनों के वनस्पतिक विकल्प उपलब्ध हैं। मैंने हाल ही में पूर्ण शाकाहारी पिज़्ज़ा बनाना भी सीख लिया है, जिसे मेरे मांसाहारी कक्ष-साथी (रूममेट) भी मजे लेकर खाते हैं और मैं कह सकता हूँ कि अब मैं पिछले कई वर्षों से ज़्यादा स्वस्थ्य महसूस कर रहा हूँ।

लेकिन मैं अपने परिवार में अकेला व्यक्ति हूँ जो मांस नहीं खाता है। मेरे अधिकांश मित्र लगभग हर खाने में मांस खाते हैं लेकिन पहले की अपेक्षा भोजन मेरे लिए अब एक अलग ही अनुभव होता है, विशेषकर तब जब मैं अपने परिजनों के घर जाता हूँ। जबकि मैं वनस्पतिक आहार अपनाकर सचमुच खुश हूँ, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि कभी-कभी खुद को भी याद न दिलाया जाय कि आखिर क्यों मैंने पशु-उत्पादों को खाना छोड़ दिया था।

ये रही कुछ बातें, ताकि अगर भविष्य में कोई पूछे कि आपको प्रोटीन कहाँ से मिलता है तो आप सहर्ष बता सकें।

शाकाहार आपके कार्बन-उत्सर्जन को आधा कर देता है

पशु-कृषि (एनिमल फ़ार्मिंग) से अकेले इतना ज़्यादा ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन होता है जितना दुनियाँ भर के कार, वायुयान और अन्य सभी वाहनों को एक साथ मिला कर भी नहीं होता। इसके अतिरिक्त, 65 प्रतिशत मानव-प्रेरित नाइट्रस-आक्साइड के लिए केवल पशु-कृषि जिम्मेदार है। याद रखिए, नाइट्रस आक्साइड एक ग्रीनहाउस गैस है जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए कार्बन-डाइआक्साइड से 296 गुणा अधिक समर्थ है और यह वातावरण में 200 वर्षों तक बना रहता है। अध्ययनों से पता चला है कि सिर्फ़ वनस्पतिक आहार अपनाकर आप अपने कार्बन-उत्सर्जन में आधे की कटौती कर सकते हैं।

मांस उत्पादन वैश्विक भूखमरी को बढ़ावा देता है


सीधे शब्दों में कहें तो लगभग 800 मिलियन लोगों के पास पर्याप्त भोजन नहीं है जबकि 90 मिलियन एकर भूमि का इस्तेमाल फ़ैक्ट्री-फ़ार्म के पशुओं के भोजन उगाने के लिये होता है। मांस उत्पादन और वैश्विक भूखमरी के बीच संबंध को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। मैकगिल यूनिवर्सिटी एवं यूनिवर्सिटी ऑफ मिनेसोटा द्वारा 2012 में किए गये एक अध्ययन के अनुसार, मनुष्य दुनिया को खिलाने के लिए पर्याप्त अनाज का उत्पादन करते हैं, लेकिन हम इसे जानवरों को खिलाना अधिक पसंद करते हैं ताकि हम मांस खा सकें।

सूअरों की बुद्धि मानव-शिशुओं के बराबर होती है

2015 में एमोरी यूनिवर्सिटी के अनुसंधानकर्त्ताओं द्वार किए गये एक अध्ययन में यह बात सामने आयी कि सूअर कुत्तों से ज़्यादा समझदार होते हैं। वे समस्यायों को वनमानुष (चिम्पैंजी) की तरह ही सुलझा सकते हैं। दीर्घ स्मरन शक्ति की बदौलत सूअर साधारण पहेली सुलझा सकते हैं और कुछ विडियोगेम भी खेल सकते हैं। सूअर भी कुत्तों की तरह आपस में खेलते हैं, नकली झगड़ा करते हैं और वे एक दूसरे से सिखने में सक्षम होते हैं। सूअर संवेदनशील होते हैं और सांकेतिक भाषा भी समझ सकते हैं। आईक्यू टेस्ट में पता चला है कि सूअरों की बुद्धि मानव शिशुओं से अधिक होती है, फिर भी एक आम मांसाहारी अमेरिकी अपने जीवन-काल में लगभग 27 सूअरों को खा जाते हैं। गर्व कीजिए कि आप उन लोगों में से नहीं हैं।

पशु-कृषि में प्रति वर्ष होती है अरबों गैलन पानी की बर्बादी


विश्व में आज संपूर्ण ताजे पानी का एक तिहाई हिस्से के खपत के लिए सिर्फ़ पशु-कृषि जिम्मेदार है। एक पाउंड गोमांस के उत्पादन के लिए 1,799 गैलन पानी का अपव्यय होता है, एक दर्जन अंडों के उत्पादन के लिए 636 गैलन पानी और एक गैलन गाय के दूध के उत्पादन के लिए स्तब्धकारी 880 गैलन पानी लगता है। आज तेजी से सूखा-ग्रस्त एवं गर्म हो रही धरती पर यह पानी की पूरी बर्बादी है।

फ़ैक्ट्री-फ़ार्मिंग में नारी-विरोध अन्तर्निहित होता है

यदि आप एक नारीवादी हैं तो फ़ैक्ट्री फ़ार्मिंग कितना नारी-विरोधी है यह बात आपको निश्चित ही यह याद दिला देगा कि आपने वनस्पतिक आहार शैली क्यों अपनाया था। मांस, दुग्ध और अंडा उद्योग नारी-सुलभ प्रजनन-तंत्र से फ़ायदा उठाते हैं। ये उद्योग मादा फ़ार्म्ड पशुओं से उनकी शारीरिक स्वतंत्रता भी छीन लेते हैं। फ़ैक्ट्री-फ़ार्मिंग परिवारों में विखंडण के लिए भी जिम्मेदार है। प्रति वर्ष करोड़ों पशु-शावकों को उनकी माँओं से अलग कर दिया जाता है ताकि उनके हिस्से का दूध हम पी सकें।

मांस में है इतनी बुराई

2013 में सीडीसी ने एक रिपोर्ट में कहा संयुक्त राज्य अमेरिका में 80 प्रतिशत एंटी-बायोटिक्स सिर्फ़ खाद्य पशुओं पर इस्तेमाल किया गया, सिर्फ़ इसलिए कि वे अप्राकृतिक रूप से बढ़ सकें और उनमें रोगों का संक्रमण रोका जा सके। सीडीसी का यह भी अनुमान है कि हर साल लगभग 20 लाख संक्रमण एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी जीवाणुओं के कारण होता है और सेंटर फ़ोर साइंस इन द पब्लिक इंटेरेस्ट की रिपोर्ट के अनुसार इनमें से 22 प्रतिशत संक्रमण का संबंध खाद्यजनित विषाणुओं से है

गायें जटिल भावनात्मक जीवन जीती हैं

यदि आप ने गायों के साथ कुछ वक्त बिताया है तो जानते होंगे कि गायें कितनी सामाजिक और संवेदनशील होती हैं और विज्ञान भी इस बात का समर्थन करता है। 2011 में हमने पाया कि गायों के झुंड में उनके बेहतरीन दोस्त होते हैं और अलग होने पर वे तनावग्रस्त महसूस करते हैं और नवंबर 2017 में एनिमल बिहेवियर एंड काग्निशन में प्रकाशित एक आलेख गायों के मनोविज्ञान (द सायक्लोजी ऑफ काउज़) के मुताबिक गायें निराशावादी या आशावादी हो सकती हैं और दुखद अनुभवों के कारण भावनात्मक रूप से प्रभावित हो सकती हैं। वे अपने बच्चों की रक्षा करती हैं और व्यक्तिगत रूप से उनके साथ अच्छा और बुरा व्यवहार करने वाले मनुष्यों को पहचानती हैं।

2048 तक हमारे समुद्र मछलीविहीन हो जायेंगे


पशु-कृषि के कारण समुद्र में बन रहे मृत-क्षेत्र और प्रजातियों की विलुप्ति के बारे में मैं जितना ज़्यादा जानता जा रहा हूँ, मुझे उतनी ज़्यादा खुशी होती है कि कम से कम एक आदमी (मैं) तो समुद्र के विनाश में भागीदार नहीं बन रहा। पृथ्वी के जीव-मंडल का 90 प्रतिशत हमारे समुद्रों पर निर्भर है और यहाँ लाखों प्रकार की प्रजातियाँ निवास करती हैं। समुद्र हमारे द्वारा उत्सर्जित लगभग एक तिहाई कार्बन-डाइआक्साइड का भी अवशोषण करते हैं और साथ-ही-साथ हमारे साँस लेने के लिए 50 प्रतिशत आक्सीजन का उत्पादन भी करते हैं। वास्तव में हमें समुद्रों की बहुत-बहुत जरूरत है। लेकिन 2010 में एक दशक तक चले अंतरराष्ट्रीय सर्वे “सेंसस ऑफ मैरिन लाइफ़" जैसे कई खोजों के अनुसार, अत्यधिक मत्स्य-हरण, जलवायु-परिवर्तन और प्रदूषण के कारण दुनियाँ भर के समुद्र तबाह हो रहे हैं।

मुर्गे-मुर्गियाँ भी हमारे घर में रहने वाले पालतु पशुओं की तरह हैं

पूर्ण शाकाहारी बनने से पहले मुझे पता भी नहीं था कि मुर्गे-मुर्गियाँ भी मेरे घर की दो पालतू बिल्लियों की तरह ही पूरे जोश में चुहलबाजी कर सकते हैं। मुझे अध्ययनों में बताये गये मुर्गियों की बुद्धिलब्धि या उनके भावनात्मक स्तर के बारे में भी पता नहीं था। इस साल में साइंस डेली में आयी एक खबर के मुताबिक, मुर्गियाँ संवेदनशील होती हैं। हर मुर्गी में कुछ विशिष्ट मातृक लक्षण होते हैं, जो उनके बच्चों के व्यवहारों को प्रभावित करते हैं। मुर्गियों में 24 अलग-अलग स्वरोच्चारण होते हैं और उसमें उतार-चढ़ाव को वे आसानी से समझ सकते हैं। यह एक विलक्षण योग्यता जो मनुष्यों में सामान्यतः सात वर्ष के आयु तक विकसित नहीं होती है।

पूरे इतिहास में सभी मानवाधिकार कार्यकर्त्ता शाकाहारी रहे हैं


अनेक शाकाहारियों और वनस्पतिक आहारियों की तरह मैंने भी कई ठोस कारणों से पशु-उत्पादों को खाना छोड़ दिया। जैसे कि पशु-अत्याचार, पर्यावरण, स्वास्थ्य इत्यादि। लेकिन पशु-उत्पादों को छोड़ने के मेरे निर्णय के पीछे एक और बड़ा कारण यह है कि दुनियाँ भर के इतिहास में सबसे प्रभावशाली मानवाधिकार कार्यकर्त्ता प्रायः शाकाहारी थे। उन महान लोगों के बारे में पढ़कर मैं मानवाधिकार और पशु-अधिकार के बीच संबंध को पूरी तरह समझ पाया और उनकी कहानियाँ आज भी मुझे वनस्पतिक जीवन शैली पर बने रहने के लिए प्रेरित करती हैं। उम्मीद है कि उनका जुनून आपको भी इस अच्छे उद्देश्य के लिए लड़ने में प्रोत्साहित करेगा।

यदि आपको अभी भी लगता है कि आपको कुछ और सहायता चाहिए, तो कोई बात नहीं! यहाँ क्लिक कर आज ही डाउनलोड कीजिए हमारा मुफ़्त शाकाहारी स्टार्टर गाइड।
व्यंजनों, नए उत्पाद टिप्स, और बहुत कुछ के साथ सूचित रहें
और शाकाहारी समाचार