आतंक: पूरी तरह से होशो-हवास में बेरहमी से मारे गए लाखों भेड़
2011 के बाद से, ब्रिटेन में बेहोश किए बिना मारे जाने वाले भेड़ और बकरियों की संख्या में लगभग दोगुनी वृद्धि हुयी है। वेट टाइम्स के मुताबिक तैतीस लाख से अधिक भेड़ और बकरियों को उचित मुर्छक दिए बिना बध किया गया था, जिसका अर्थ है कि वे पूरे होशो-हवास में थे और हत्या के दर्द को महसूस करने में सक्षम थे।

रॉयल कॉलेज के पशु-सल्य चिकित्सा विभाग के पूर्व अध्यक्ष, प्रोफेसर लॉर्ड ट्रीज कहते हैं:

“तीस लाख भेड़ों का गला बिना बेहोश किए काटा जा चुका है। क्या मंत्री इस बात से सहमत हैं कि पशु कल्याण के क्षेत्र में हम पीछे की तरफ जा रहे हैं?

हम निश्चित रूप से तर्क देंगे कि यह एक बहुत ही बड़ा प्रतिगामी कदम है।”

खाद्य मानक एजेंसी द्वारा इंग्लैंड और वेल्स के लिए आयोजित एक सर्वेक्षण का अनुमान है कि पिछले साल 18.4 करोड़ पक्षी और 21,000 गायों को प्रभावी रूप से अचेत किए बिना ही कत्ल किया गया था।

2016 में, मर्सी फ़ोर एनिमल के एक बहादुर पशु-शोधकर्ता ने मैक्सिकन सरकार के स्वामित्व वाली वधशालाओं में भयावह क्रूरता का पर्दाफ़ाश किया था। एमएफए के इतिहास में सबसे दु:खद और क्षुब्धकारी घटनाओं में से एक माने जाने वाले जांच में उजागर किया गया है कि गायों और सूअरों को पूरे होशो-हवास में काटा गया, जबकि वे दर्द महसूस करने में सक्षम थे।

देखिए।


कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य निर्यात विकास प्राधिकरण के अनुसार, भारत भेड़ और बकरी के मांस का विश्व के सबसे बड़े निर्यातकों में से एक है। अधिकांश जानवर राजस्थान, जम्मू और कश्मीर, उत्तर प्रदेश, गुजरात और उत्तरी और पूर्वी हिमालय के पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। अकेले 2017 में, भारत से 22,060 मीट्रिक टन भेड़ और बकरी के मांस का निर्यात किया गया।

अफसोस की बात है कि मांस के लिए पाले गए अधिकांश जानवरों की तरह, भारत में भी भेड़ों को न केवल हिंसक हत्या बल्कि क्रूर अंगभंग एवं गंदगी से भरे जगहों पर रहने के लिए भी मजबूर किया जाता है।

जन्म के कुछ हफ्ते बाद ही, भेड़ के निरीह बच्चे "पूंछ-हनन" की पीड़ा को सहन करते हैं। बिना किसी एनेस्थेटिक्स (बेहोशी की दवा) दिए निर्दयतापूर्वक उनका पूँछ काट दिया जाता है जिसके परिणामस्वरूप उन्हें अक्सर संक्रमण, दुर्दांत पीड़ा एवं रेक्टल फैलोप्सस का शिकार होना पड़ता है।

मादा भेड़ अपने बच्चों के साथ मजबूत बंधन बनाते हैं और उनकी देखभाल करते हैं। वे बहुत दूर भटक चुके अपने शिशुओं के व्यक्तिगत आवाज़ को भी पहचान सकती हैं। फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर, इन रिश्तों को बड़ी क्रूरता से तोड़ दिया जाता है, जब भेड़ के बच्चों को कुछ ही दिनों में उनकी माओं से दूर कर दिया जाता है।

आम तौर पर भेड़ के बच्चे लगभग छः से आठ महीने की उम्र में ही बलि चढ़ जाते हैं, जो कि उनके प्राकृतिक जीवन काल का केवल एक छोटा सा अंश है।

स्विस पशु अधिकार समूह पौर एल एगलिटे एनिमेल द्वारा बकरी और भेड़ वधशाला पर कर लिया गया यह मर्मभेदी गुप्त वीडियो फुटेज देखिए।


पशुओं को प्रभावी रूप से मुर्छित किए बिना मारना बेहद क्रूर है। उन्हें सिर्फ़ स्वाद के लिए मारा जाता है। फ़ार्म्ड-पशुओं की पीड़ा को समाप्त करने के लिए सबसे अच्छा काम तो यही होगा कि हम अपनी थालियों से पशुओं को अलग कर दें।

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