वीवर्क में मांसाहार वर्जित: कंपनी ने सामीष भोजन का भुगतान करने से किया इंकार
यदि आपका कार्यालय भी साझा कार्यस्थल का हिस्सा है, या आपने सोशल मीडिया पर इसका विज्ञापन देखा है तो, आपको वीवर्क के बारे में मालूम होगा। वीवर्क एक ऐसी कंपनी है जो विश्वभर में साझा कार्यस्थल की सेवा प्रदान करती है। भारत के मुंबई, बंगलोर और हैदराबाद समेत दुनियाँ भर में फैले वीवर्क में करीब 6,000 से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं। भारत के ट्रैफ़िक-पीड़ित शहरों में विकेन्द्रीकृत कार्यालय तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं ऐसे में वीवर्क बहुत ही सही समय पर बाज़ार में आया है। एक तरफ़ यह जहाँ अपने अनोखे कार्यस्थल के बल पर लोगों को आकर्षित कर रहा है, फिलहाल वीवर्क एक अलग कारण से सूर्खियों में है। पहले से ही अनेक करुणापूर्ण और दीर्घकालिक नीति अपना चुकी इस कंपनी ने इस बार पर्यावरण और पशुओं की सुरक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है।

ब्लूमबर्ग में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक अपने कर्मचारियों से बिल्कुल ही साफ़ शब्दों में कह दिया है कि कंपनी अब अपने कर्मचारियों के मांस, अंडा या पोर्कयुक्त सामीष आहारों का भुगतान नहीं करेगी।

वीवर्क के सहसंस्थापक मीगल मैक्लेवी ने कहा कि पर्यावरण की रक्षा की दिशा में कंपनी की नयी नीति के तहत कर्मचारियों के लिए आंतरिक "गृष्म-शिविर" उपस्थित लोगों के लिए मांसाहारी व्यंजनों का विकल्प नहीं होगा। मैक्लेवी ने कहा:

"नये अनुसंधानों में ऐसे संकेत मिलते हैं कि पर्यावरण की रक्षा के लिए व्यक्तिगत स्तर पर मांसाहार का त्याग सबसे बड़ा काम है, यहाँ तक कि यह हाइब्रीड कारों की सवारी करने से भी अधिक प्रभावशाली है।"

निरामीष नीति पूरी कंपनी पर लागू होती है। यात्रा-भत्ता से लेकर वीवर्क के कुछ कार्यालयों में अवस्थित स्वयं-सेवा कियोस्क में भी मांसाहारी व्यंजनों के लिए कोई स्थान नहीं होगा। इसी के साथ 20 करोड़ डॉलर की कुल संपत्ति वाली कंपनी वीवर्क ने दुनियाँ भर की अन्य बड़ी कंपनियों के लिए एक उच्च मानक स्थापित किया है।

वीवर्क पर्यावरण की सुरक्षा के लिए मांस पर प्रतिबंध लगाने वाली अकेली कंपनी नहीं है। जलवायु परिवर्तन से लड़ने के उद्देश्य से, वर्ष 2017 में जर्मनी की केन्द्रीय पर्यावरण मंत्री बरबरा हेन्ड्रिक्स ने सभी सरकारी दावतों में मांसाहार पर प्रतिबंध लगा दिया था। पर्यावरण मंत्रालय ने एक बयान में कहा था:

हम किसी से ये नहीं कह रहे कि उन्हें क्या खाना चाहिए। लेकिन जलवायु की रक्षा के लिए हम एक अच्छा उदाहरण प्रस्तुत करना चाहते हैं, क्योंकि मांस और मछली के मुकाबले शाकाहारी भोजन अधिक जलवायु-हितैषी होते हैं।

और जून में उद्घाटित एक रिपोर्ट में संयुक्त राष्ट्रसंघ ने सभी देशों से कार्बन उत्सर्जन में कमी लाने के लिए मांस एवं दुग्ध उत्पाद में कटौती करने का आग्रह किया था। रिपोर्ट के प्रारूप के अनुसार, वैश्विक तापमान निरंतर बढ़ रहा है और 2040 तक इसके पैरिस समझौते को पार करते हुए 1.5° सेन्टीग्रेड (2.7° फ़ारेनहाइट) तक बढ़ जाने की उम्मीद है। इसमें यह भी कहा गया है कि यदि शीघ्र और दूरगामी प्रयास नहीं किए गये तो अनेक देश इस खतरनाक तापमान सीमा के नीचे भी गर्म होने लगेंगे।

पशु-कृषि जलवायु-परिवर्तन का एक प्रमुख कारक है। मांस और दुग्ध उद्योग में इतने अधिक संशाधनों का अपव्यय होता है कि विश्व बैंक द्वारा कराये गये एक अध्ययन के मुताबिक लगभग 91 प्रतिश आमेजन वर्षावनों के विनाश के लिए सिर्फ़ पशु-कृषि जिम्मेदार है। खाद्य पशुपालन के लिए लगभग एक तिहाई धरातल का उपयोग होता है। सभी कार, वायुयान एवं सभी अन्य परिवहन माध्यमों के साझा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन से भी कहीं अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के लिए पशु-कृषि जिम्मेदार है। और इस पशु-कृषि ने अभी तक दुनियाँ भर में 500 से अधिक नाइट्रोजन बर्धित मृत क्षेत्रों का निर्माण कर चुका है।

ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय द्वारा कराए गये एक हालिया अध्ययन में पाया गया है कि पशु-उत्पादों का परित्यागकर व्यक्तिगत कार्बन उत्सर्जन में 73 प्रतिशत की कमी लायी जा सकती है। वास्तव में, अनुसंधानकर्त्ताओं ने कहा कि यदि प्रत्येक व्यक्ति पूर्णतः शाकाहारी हो जाता है, वैश्विक भूमि उपयोग में 75 प्रतिशत की कमी लायी जा सकती है। यह भूभाग संयुक्तराज्य अमेरिका, चीन, ऑस्ट्रेलिया और पूरे यूरोप के साझा क्षेत्रफल के बराबर होगा।

वनस्पति आधारित आहार न केवल पर्यावरण के लिए अच्छा है बल्कि यह अनगिनत पशुओं को भी फ़ैक्ट्री-फ़ार्मिंग के नारकीय पीड़ायुक्त जीवन से भी बचाता है।

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