अध्ययन: जैव-विविधता की 60 प्रतिशत हानि सिर्फ़ मांस से होती है
विश्व वन्यजीव कोष द्वारा कराये गये "एपेटाइट फॉर डिस्ट्रक्शन" नामक एक अध्ययन यह पाया गया कि गाय, सूअर, मुर्गी और अन्य जानवरों को खिलाने के लिये बड़े पैमाने पर सोया और मक्का जैसे चारा फसलों को उगाने के लिये प्राकृतिक संसाधनों, भूमि, जल और वन्य जीवन को नष्ट किया जा रहा है।

अध्ययन में खुलासा हुआ है कि खाद्य-पशुओं को खिलाने के लिये उगाये जाने वाले फसलों के कारण अमेज़न, कांगो बेसिन, और हिमालय सहित दुनिया के कुछ सबसे अतिसंवेदनशील क्षेत्रों पर खतरा मंडराने लगा है।

डब्लूडब्लूएफ के एक खाद्य नीति प्रबंधक डंकन विलियमसन कहते हैं, 

"दुनिया में आजकल पशुद-प्रोटीन की जरूरत से ज्यादा खपत किया जा रहा है और यह वन्य जीवन पर विनाशकारी प्रभाव डाल रही है।" उन्होंने आगे कहा कि "वैश्विक जैव विविधता के नुकसान का 60% हिस्सा खाद्य जीवों के कारण होता है। हम जानते हैं कि बहुत से लोगों को पता है कि मांसाहार जल और पर्यावरण को कुप्रभावित करने के साथ-साथ ग्रीनहाउस गैस के उत्सर्जन को भी प्रभावित करता है लेकिन शायद कुछ लोगों को ही पता हो कि सबसे बड़ा मुद्दा यह है कि एक बड़े भू-भाग का फ़सल खाद्य-पशुओं को खिलाया जा रहा है।"

विश्व वन्यजीव निधि और जूलॉजिकल सोसाइटी ऑफ़ लंदन द्वारा बहुत बड़ी तादाद में जीवों के दुखद विलुप्ति की खबर दी गयी थी। इसमें संकेत मिलता है कि 1 9 70 और 2012 के बीच पशु आबादी में 58% की गिरावट आई थी, और 2020 तक 67% तक पहुंचने की संभावना है।

खाने के लिये पाले जाने वाले पशुओं के चारागाह उन्हें खिलाने के लिये अनाज उपजाने में अब एक तिहाई से अधिक जमीन का उपयोग होता है। इसके अतिरिक्त, विश्व बैंक के अनुसार पशु कृषि लगभग 91 प्रतिशत अमेज़ॅन विनाश के लिए सिर्फ़ पशु-कृषि दोषी है।

इससे भी बुरा यह है कि फ़ार्म्ड पशुओं द्वारा हर मिनट 70 लाख पाउंड मल-मूत्र उत्सर्जित किया जाता है। यह मल-मूत्र जलाशयओं और आस-पास के पारिस्थितिक तंत्र को प्रदूषित करता है, वन्यजीव को मारता है। दुनियाँ भर के परिवहन के सभी साधनों को एक साथ मिलाने से भी अधिक ग्रीनहाउस गैस का उत्सर्जन पशु-कृषि के कारण होता है जो कि अंततः जलवायु परिवर्तन के नाटकीय प्रभावों को बढ़ाता है।

पशु कृषि न केवल पर्यावरण के लिए हानिकारक है बल्कि निश्चित रूप से क्रूर भी है। खाद्य पशुओं के साथ महज किसी वस्तु जैसा निर्मम व्यवहार किया जाता है और उनका छोटा सा जीवन अकल्पनीय क्रूरताओं, गहन कारावास, पीड़ादायक अंगभंग, और अंत में हिंसक मौत की भेंट चढ़ जाता है।


यह समाचार हॄदयविदारक है लेकिन इन पर कार्रवाई करने के लिए अभी भी वक्त है। हम मांस, डेयरी और अंडे को त्यागकर एवं अधिक स्वस्थ एवं मानवीय विकल्प अपनाकर इस क्रूर व्यवस्था से अपना समर्थन वापस ले सकते हैं।
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