हुक से मछली फ़ँसाना है क्रूरता, उत्तराखण्ड ने लगाया प्रतिबंध
एंगलिंग अर्थात हुक से मछली फ़ँसाने की क्रिया को क्रूरता के रूप में परिभाषित करते हुए, उत्तराखण्ड ने राज्य की सभी नदियों एवं जलाशयों में एंगलिंग पर प्रतिबंध लगा दिया है। भारत का यह पर्वतीय राज्य ऐसा करने वाला पहला राज्य बन गया है। जैसा कि कहा गया है एंगलिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें धातु के हुक एवं धागे जिसे भारत के कुछ हिस्सों में वंशी के नाम से भी जाना जाता है, से मछलियों को फँसाया जाता है और फिर उन्हें वापस पानी में छोड़ दिया जाता है। किसी के लिए यह खेल और आनंद का साधन हो सकता है लेकिन मछलियों के लिए यह निहायत ही क्रूर होता है और इस क्रम में उन्हें घातक घावों का शिकार होना पड़ता है।

प्रदेश के अग्रणी दैनिक हिन्दुस्तान टायम्स में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रधान मुख्य वन संरक्षक जय राज ने इस दिशा में आदेश निर्गत करते हुए कहा कि ‘एंगलिंग’ पशु अत्याचार रोकथाम कानून की धारा 11 के अन्तर्गत अपराध है और इसीलिए इसे राज्य भर में प्रतिबंधित किया गया है।" जय राज जो फॉरस्ट फ़ोर्स के भी अध्यक्ष हैं, ने आगे कहा कि राज्य कैसे ऐसी नीति अपना सकती है जो कानून भंग करती हो।

उत्तराखंड ने यह प्रतिबंध प्रदेश के वन मंत्री एवं मुख्य सचिव की उपस्थिति में मुख्यमंत्री श्री त्रिवेन्द्र सिंघ रावत द्वारा स्वीकृति मिलने के महीने भर बाद वन विभाग ने इस आशय की अधिसूचना जारी की।

अधिसूचना के अनुसार, "एंगलिंग में इस्तेमाल किए जाने वाला हुक मछली के मुँह के नीचले हिस्से में चुभ जाता है, जिससे उन्हें घोरा पीड़ा एवं आघात पहुँचता है।" अधिसूचना में उत्तराखण्ड उच्च न्यायालय द्वारा 4 जुलाई को दिए गए ऐतिहासिक निर्णय को भी उद्धृत किया गया है जिसमें न्यायालय ने पक्षी एवं जलीय जीव समेत संपूर्ण पशु-साम्राज्य के कानूनन अस्तित्व पर मुहर लगाया था जिसके अनुसार उनके (पशु-पक्षियों के) पास संबंधित अधिकारों, कर्तव्यों एवं जिम्मेदारियों के साथ एक विशिष्ट व्यक्तित्व होता है। न्यायालय ने राज्य के सभी नागरिकों को इन पशु-पक्षियों के ’पर्सन इन लोको पैरेन्टिस’ अर्थात पशुओं के अभिभावक के रूप में मान्यता दी है।

राज्य-सरकार का यह स्वागत योग्य कदम जलीय जीवों समेत राज्य भर के तमाम जीव जगत के लिए निश्चित रूप से सहायक होगा। मत्स्यहरण पहले से ही हमारे सामुद्रिक पारिस्थितिक तंत्र के लिए खतरा बन चुका है और तेजी से हमारे महासागरों को मारता जा रहा है।

बेलगाम मत्स्यहरण कई सजीव समुदायों को विलुप्ति के कगार पर पहुँचा चुका है। आज विश्व के तीस प्रतिशत से अधिक मत्स्य-भंडार मत्स्यहरण की संधारणीय सीमा से आगे बढ़ चुके हैं।

यह समस्या सिर्फ़ बड़ी मछलियों के साथ ही नहीं है। स्टैन्फ़ोर्ड के वैज्ञानिको के नेतृत्व में किए गए एक नये अध्ययन में खुलासा हुआ है कि छोटी मछलियों की स्थिति भी समानरूप से भयावह है। संयुक्त राष्ट्रसंघ की खाद्य एवं कृषि संस्था के अनुसार दुनियाँ के एक चौथाई मत्स्य-भंडार छोटी मछलियों को निशाना बनाते हैं।

इसके अतिरिक्त, जलवायु परिवर्तन मछलियों को अधिक ठंडे पानी में शरण लेने पर मजबूर करता है, अत्यधिक मत्स्य-हरण पहले से ही दुर्बल पारिस्थितिक तंत्र के लिए चुनौती खड़ा करता है। मछलियों को अपनी थाली से हटाकर, आप इन उद्योगों से अपना समर्थन वापस ले सकते हैं जो पशुओं को निर्दयतापूर्वक मारते हैं और हमारे पर्यावरण का विनाश करते हैं। करुणापूर्ण जीवन शैली अपनाना चाहते हैं? शुरु करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए। 
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