तेजी से बढ़ने को मजबूर फ़ार्म्ड सैल्मन हो रहे बहरे!
प्रायोगिक जीवविज्ञान के जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, फ़िश फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर पैदा होने वाले सल्मन को इस तरह की त्वरित दर से बढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है, जिसके कारण इनमें से आधे से अधिक आंशिक रूप से बहरे हो जाते हैं।

मेलबर्न विश्वविद्यालय के नेतृत्व में किये गये अध्ययन में पाया गया कि इन फ़ार्म्ड मछलियों में आंतरिक कान विकृति विकसित हो जाती है। चूंकि सैल्मन अप्रकृतिक रूप से इतनी जल्दी से बढ़ते हैं कि ओटोलिथ, या छोटे क्रिस्टल, उनके आंतरिक कान में ठीक से विकसित नहीं हो पाते। डेली मेल के अनुसार, ध्वनि का पता लगाने के लिए आवश्यक सामान्य ओटोलिथ एरागोनिट खनिज से बने होते हैं, लेकिन विकृत ऑटोलिथ आंशिक रूप से वैटेराइट से बनते हैं, जो हल्के, बड़े और कम स्थिर होते हैं। इन बड़े और कमजोर ओटोलिथ के कारण स्रवण-असंतुलन और सुनने की क्षमता में कमी हो सकती है।

यह विकृति पहली बार 1 9 60 के दशक में दर्ज की गई थी, लेकिन यह नया अध्ययन यह दिखाता है कि यह दुनियाँ भर में फ़ैले हुए फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर उत्पादित मछलियों की 95 प्रतिशत से अधिक संख्या इससे प्रभावित है। इस अध्ययन में नॉर्वे, चिली, स्कॉटलैंड, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया की फ़ार्म्ड मछलियाँ शामिल हैं। इस शोध में पाया गया कि फ़ार्म्ड मछलियों मेम यह स्रवण विकृति बहुत ही सामान्य थी। उक्त अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि 50 प्रतिशत से अधिक फ़ार्म्ड सैल्मन कम से कम आंशिक रूप से बधिर हैं, विकृति उपचार के योग्य भी नहीं और उम्र बढ़ने के साथ-साथ यह बद से बदतर होती जाती है।

Phys.org के साथ एक साक्षात्कार में, अध्ययन के सह-लेखक डॉ. टिम डेमप्स्टर ने कहा 

कि शोध के ये परिणाम फ़ार्म्ड मछली के कल्याण के बारे में गंभीर सवाल उठाते हैं। कई देशों में, कृषि पद्धतियों को "पाँच स्वतंत्रता" के लिए अनुमति दी जानी चाहिए। भूख या प्यास से स्वतंत्र हैं; असुविधा से स्वतंत्रता; दर्द, चोट, या बीमारी से स्वतंत्रता; सामान्य व्यवहार व्यक्त करने की स्वतंत्रता; और भय और संकट से स्वतंत्रता। विकृतियों के साथ जानवरों का उत्पादन इन दो स्वतंत्रताओं का उल्लंघन करता है: रोग से स्वतंत्रता और सामान्य व्यवहार को व्यक्त करने की स्वतंत्रता।

इससे भी बदत स्थिति तो यह है कि बहरापन तो फ़ार्म्ड सैल्मन लिए सिर्फ एक समस्या है। रॉयल सोसाइटी ओपन साइंस के एक अध्ययन में पाया गया है कि अनेक फ़ार्म्ड सैल्मन गंभीर अवसाद से पीड़ित होते हैं। इन्हें "ड्राप आउट" के रूप में जाना जाता है और ये प्रायः उदास, गंदे टैंकों में बेजान की तरह तैरते रहते हैं।

ड्रॉप-आउट सैल्मन में, वैज्ञानिकों ने तनाव-प्रतिक्रिया को उद्दीप्त करने वाले हार्मोन कोर्टिसोल के उच्च स्तर की उपस्थिति के साथ-साथ सेलोटोनर्जिक प्रणाली में बढ़ी हुई गतिविधियों को देखा जो नींद, श्वसन और मूड के प्रमुख नियामक होते हैं। दिलचस्प बात यह है कि गरीबी और अन्य सामाजिक आर्थिक कठिनाइयों से ग्रस्त इंसानों के अध्ययन में इसी तरह के शारीरिक परिवर्तन का पता चला है।

इसके अतिरिक्त,फ़ैक्ट्री फ़ार्म इतने गंदे होते हैं कि वहाँ परजीवियों (बैक्टीरिया) का पनपना बहुत ही आसान होता है। पिछले साल, समुद्र के जूँ का प्रकोप स्वीडन से लेकर चिली और नॉर्वे तक में हुआ था। अब करीब आधा स्कॉटलैंड के सैल्मन फार्म परजीवी-संक्रमण से पीड़ित है। ये परजीवी सामान्यतः सैल्मन के रक्त, त्वचा और कीचड़ पर पलते हैं।

इन परजीवियों का मुकाबला करने के लिए, किसान वाइल्ड रैसे (एक प्रकार की मछली) की आबादी को नष्ट कर रहे हैं। न्यू साइंटिस्ट के मुताबिक, नॉर्वे में पकड़े जाने वाले रैसे की संख्या 2008 में बीस लाख से बढ़कर महज एक दशक से भी कम समय में ही में दो करोड़ बीस लाख तक पहुँच गयी है। इन मछलियों की संख्या में कमी के कारण समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर एक अप्रत्याशित प्रभाव होगा। इससे भी बदतर यह है कि जूँ खाने की कर्तव्य के बाद निकाल इन मछलियों को मार कर फ़ेंक दिया जाता है।

संयोग से, शाकाहारी समुद्री आहार के पर्याप्त विकल्प उपलब्ध हैं जोक्रूर वाणिज्यिक मतस्योद्योग में योगदान नहीं करते हैं और समुद्री मछली की आबादी को भी नुकसान नहीं पहुँचाता है।

दयापूर्ण, स्वास्थ्यवर्धक वनस्पतिक आहार के संबंध में और जानने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
व्यंजनों, नए उत्पाद टिप्स, और बहुत कुछ के साथ सूचित रहें
और शाकाहारी समाचार