युवा पीढ़ी समझे कि वे क्या खा रहे हैं।
हमें यानी कि युवा पीढ़ी को अक्सर आलसी, रोबदार और बाप की दौलत से चिपके रहने वाला समझा जाता है। लेकिन यह सच्चाई नहीं है और न ही हम यहाँ इस पर चर्चा करने जा रहे हैं। आज जरूरत है कि युवा पीढ़ी इस पर बात करे कि हमारे भोजन का हमारे स्वास्थ्य और संसार पर क्या प्रभाव पड़ता है।

हम सिर्फ़ दुनियाँ की सबसे बड़ी पीढ़ी ही नहीं हैं बल्कि हम आत्मचिन्हित निरामिष एवं शाकाहारियों की पीढ़ी हैं। हमें स्वास्थ्य की चिंता है, पर्यावरण की चिंता है और पशु-कल्याण की चिंता है। हममें से लगभग 12 प्रतिशत लोग पशु उत्पादों का पूर्ण परित्याग कर चुके हैं

यह अच्छी बात है कि हम में से इतने लोग खाने का ध्यान रखते हैं लेकिन यह भी जरूरी है कि हम सभी मांस, दूध एवं अंडा से बने उत्पादों के सेवन के कुप्रभावों को समझें।

सबसे पहले पर्यावरण की बात। यह साफ़ है कि खाने के लिये पशुओं को मारने से हमारी पृथ्वी मर रही है। जरा इस पर विचार कीजिये : खाने के लिये पाले जाने वाले पशुओं से इतना अधिक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित होता है जितना परिवहन के तमाम साधनों को एक साथ मिलाकर भी नहीं होता। सिर्फ़ पशु उत्पादों को कम कर हम कार्बन के उत्सर्जन को आधा कर सकते हैं।

पशु-कृषि न केवल जलवायु परिवर्तन का प्रमुख कारण है, यह जल प्रदूषण का भी अग्रणी स्रोत है। इसका बड़ा प्रभाव प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ता है। उदाहरण के लिये, एक पाउंड सोया के मुकाबले एक पाउंड गोमांस के उत्पादन के लिये तेरह प्रतिशत अधिक जीवाश्म इंधन की जरूरत होती है और पन्द्रह प्रतिशत अधिक पानी की। यदि आप कहते हैं कि आप पर्यावरण की चिंता करते हैं, तो समय आ गया है कि वनस्पतिक आहार अपनाइये।

इस बात की ज़्यादा संभावना है कि मिलेनियल्स यानी कि आज की युवा पीढ़ी के पास स्वास्थ्य का बीमा न हो, ऐसे में यह और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम पशु उत्पाद खाने से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभावों को समझें। अध्ययन दर अध्यन यह बात सामने आयी है कि आपका स्वास्थ्य सुधारने का सबसे अच्छा उपाय है वनस्पतिक आहार। वास्तव में, मायो क्लिनिक पर शोधकर्ताओं ने पाया कि छोटे समय के लिए शाकाहारियों के मुकाबले सतरह साल या उससे अधिक समय से शाकाहारी लोगों का जीवन काल औसतन साढ़े तीन साल अधिक रहा। सोचिये, इस अतिरिक्त समय में आप क्या कमाल कर सकते हैं !

पर्यावरण और स्वास्थ्य के बाद हम युवाओं को अपने भोजन की चिंता सबसे अधिक इसलिये करनी चाहिये कि इससे फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर पड़ने वाले अनगिनत पशुओं के जीवन पर भारी प्रभाव पड़ता है।

खाने के लिये पाले और मारे जाने वाले गाये, सूअर, और मुर्गियाँ हमारे घरों में प्यार से पलने वाले कुत्ते और बिल्लियों की तरह ही स्मार्ट और संवेदनशील होते हैं। लेकिन फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर उन्हें घोर पीड़ा, बर्बर अंग-भंग और अंत में हिंसापूर्ण मौत का सामना करना पड़ता है।

आप खुद ही देखिये:


संयोग से हमारे पास इसे रोकने की शक्ति है। केवल वनस्पतिक आहार अपना कर हम पृथ्वी, पशु और स्वयं की मदद कर सकते हैं। हमें पता है कि आप क्या सोच रहे हैं। अरे! आप अब भी लाजवाब व्यंजनों का मजा ले सकते हैं।

तो क्या कहते हैं? आइये हम वो पीढ़ी बनें जो इस क्रूर और अनावश्यक उद्योग पर लगाम लगाये। एक ऐसी दुनियाँ बनायें जहाँ जीव-मात्र के लिये दया और करुणा हो। शुरु करने के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
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