मछलियाँ दर्द महसूस करती हैं। आप उन्हें खाते क्यों हैं?
हकाई पत्रिका के एक हालिया लेख में कई वैज्ञानिक अध्ययनों पर प्रकाश डाला गया है जो यह सिद्ध करते हैं कि स्थलीय जीवों की तरह ही मछलियाँ भी दर्द महसूस करती हैं।

वैज्ञानिक समुदाय इस बात को स्वीकार करने में काफी पीछे रहा है कि मछली को दर्द महसूस होता है, लेकिन अब बहुत से जीव-वैज्ञानिक और पशु चिकित्सकों से सहमत होते हुए वे मानने लगे हैं कि मछलियाँ दर्द महसूस करती हैं। लिवरपूल यूनिवर्सिटी के जीव-वैज्ञानिक और मछलियों के दर्द के विशेषज्ञ लिन स्नेडन ने हकाई पत्रिका को बताया कि "2003 में यदि मैं पूछता कि कितने लोग मानते हैं कि मछलियाँ दर्द महसूस करती हैं तो मुश्किल से एक-दो लोग अपना हाथ उठाते लेकिन यदि यही बात इस कमरे में आज पूछी जाए तो लगभग सभी लोग अपना हाथ उठायेंगे।

कुत्तों, बिल्लियों और अन्य पशुओं की तरह मछलियाँ भी पीड़ा और आनंद का अनुभव करती हैं। वैज्ञानिक स्तंभकार, फेरिस जाबर लिखते हैं:

"वैज्ञानिकों का मानना ​​है कि यदि सभी नहीं तो बहुत सारे, कशेरुक (साथ ही कुछ अकशेरूक) प्राणी चैतन्य होते हैं और चेतनापरक अनुभूति के लिए मनुष्य की तरह फूली हुई सेरेब्रल कॉर्टेक्स जरूरी नहीं है। इस ग्रह पर कई प्रकार के मस्तिष्क वाले जीव पाए जाते हैं। घने और स्पंजी, गोलाकार और लम्बी, अनार के रूप में छोटे और तरबूज के रूप में बड़े। विभिन्न पशु वंशावली में पृथक-पृथक तंत्रिका तंत्र होते हैं। पीड़ा की अनुभूति के लिए मनुष्यों जैसा दिमान होना ही जरूरी नहीं है।"

अफसोस की बात है, जबकि मछलियों के दर्द महसूस करने की क्षमता जोरदार तरीके से साबित हो चुकी है, अभी तक उन्हें क्रूरता से कोई सुरक्षा नहीं दी जाती है। वास्तव में, एक भी कानून संयुक्त राज्य अमेरिका में मछलियों की रक्षा नहीं करता है, चाहे वे पालतू जीव के रूप में, शोध के लिए या भोजन के लिए पाले जाते हों।

इस से भी दुखद यह है कि खाने के लिए पाली एवं मारी जाने वाली मछलियों को नारकीय पीड़ा के दौड़ से गुजरना पड़ता है। गंदे और तंग मतस्य फ़ैक्ट्री-फ़ार्म परजीवियों के प्रजनन एवं वृद्धि के लिए अनुकूल जगह होते हैं। पिछले साल समुद्री जूँओं का संक्रमण स्कैंडिनेविया से चिली तक फैला था। अब स्कॉटलैंड के सैल्मन फार्मों में से लगभग आधे सैल्मन रक्त, त्वचा और कीचर पर पलनेवाले परजीवीओं के संक्रमण से पीड़ित हैं।

मत्स्य-पालन न केवल घृणित और खतरनाक है बल्कि यह अविश्वसनीय रूप से क्रूर भी है। प्रायोगिक जीवविज्ञान जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मत्स्य-पालन केन्द्रों पर सैल्मनों को इतनी त्वरित दर से बढ़ने के लिए मजबूर किया जाता है कि उनमें से आधे से अधिक आंशिक रूप से बधिर हो जाते हैं। एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि कई फ़ार्म्ड सैल्मन गंभीर अवसाद से पीड़ित रहते हैं। "ड्रॉप-आउट" कहलाने वाले ये अवसाद-ग्रस्त सैल्मन निर्जीव की तरह पानी के ऊपर तैरते रहते हैं।

2011 में मर्सी फॉर एनिमल्स द्वारा एक मत्स्य वधशाला में किए गए गुप्त-जाँच में मजदूरों को जीवित मछलियों की त्वचा उधेरते हुए पाया गया था। मछलियाँ मजदूरों के चाकूओं से बचने के लिए संघर्ष करती नजर आ रही थी। बेचारी मछली ऑक्सीजन के लिए तड़प रही थी, और मजदूर निर्दयतापूर्वक चिमटी से उनकी चमरी उधेर रहे थे।

भयानक लगता है, ना? आप स्वयं देख लीजिए।


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