मत्स्य उद्योग का कबूलनामा: हर साल फ़ेंकते हैं लाखों बोरी बीमार सैल्मन मछलियाँ
हेराल्ड के अनुसार, स्कॉटिश मछली पालन उद्योग ने स्वीकार किया कि पिछले साल उन्होंने 10 लाख बीमार और संक्रमित सैल्मन मछलियों को फ़ेंका था।

सरकारी रिकॉर्ड से पता चलता है कि मृत और बीमार मछलियों की संख्या साल 2013 के बाद से हर साल लगभग दोगुनी हो रही है जो साल 2016 में एक रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुँच गया। मतस्य उद्योग मछलियों की बीमारी और मृत्यु के लिए संक्रमण और समुद्री जूँ के प्रकोप को दोषी मानते हैं। इन मरी हुई मछलियों को एक भष्मक में जलाकर मार डाला जाता है।

स्कॉटलैंड के राष्ट्रीय न्यास में वरिष्ठ प्रकृति संरक्षण सलाहकार डॉ रिचर्ड लुक्ममूोर कहते हैं: "सैल्मन पालन उद्योगों के पास मछलियों के रोगों को नियंत्रित करने की क्षमता नहीं रह गयी है। परिणामतः समुद्रों में बहुतायत से जहरीले रसायणों का स्राव किया जा रहा है जो निहायत ही निरर्थक प्रयास है। इसके अलावा यह हमारे तटीय जलों में अपरिहार्य रूप से संक्रामक जीवों को प्रवेश देता है।

मतस्य पालन उद्योग की यह नवीनतम भयावह कहानी तो सिर्फ़ समाचार की सुर्खियाँ बनने के लिए है। वैंकूवर के एक सैल्मन फ़ार्मों पर किये गये गुप्त जाँच की वीडियो फ़ुटेज में पता चलता है कि किस प्रकार कमजोर व अंधे सैल्मन अपने ही मल-मूत्र में तैरते रहते हैं।

गंदे और तंग फैक्टरी फ़ार्मिंग परजीवियों के प्रजनन के लिये एकदम मुफ़ीद जगह होते हैं। पिछले साल स्कैंडेनेविया से लेकर चिली तक समुद्री जूँ का प्रकोप फैला हुआ था। फिलहाल स्कॉटलैंड के सैल्मन फ़ार्मों की लगभग आधी मछलियाँ परजीवियों के संक्रमण से पीड़ित पाये जाते हैं, जो उनके रक्त, त्वचा और कीचड़ पर पलते हैं।

लेकिन गंदगी और संक्रमण तो बस शुरुआत है।

प्रायोगिक जीवविज्ञान के जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर सैल्मन मछलियों को तेजी से बढ़ने के लिये इस प्रकार नस्लीकृत किया जाता है कि उनमे से आधे से अधिक तो आंशिक रूप से बहरे हो जाते हैं\ एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर पाले गये अनेक सैल्मन गंभीर अवसाद से ग्रस्त होते हैं। ऐसे सैल्मन उदासीन भाव से बेजान की तरह पानी की उपरी सतह पर तैरते रहते हैं, जिन्हें ‘ड्रॉप आउट’ कहा जाता है।

फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर तमाम उत्पीड़न के बाद कई मछलियाँ तो विशेष रूप से बर्बर मौत का शिकार होती हैं। उनके दर्द महसूस करने की क्षमताओं के बावजूद मतस्य उद्योग उनके साथ महज एक निर्जीव वस्तु जैसा व्यवहार करता है।

मर्सी फ़ोर एनिमल द्वारा एक मतस्य फ़ार्म पर किये गये गुप्त जाँच में उजागर हुआ था कि किस निर्दयता के साथ जिंदा मछलियों की त्वचा को छीला जा रहा था, बेचारी मछलियाँ मजदूरों की चाकुओं से बचने के लिये संघर्ष कर रही थीं। मछलियाँ आक्सीजन के लिये तड़प रही थी और श्रमिक उनकी त्वचा को बेरहमी के साथ चिमटे से छीले जा रहे थे।


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