लोग अब मेमना खाना क्यों छोड़ रहे हैं!
हम सब अँग्रेजी के बालगीत “मैरी हैड अ लिट्ल लैम्ब” से परिचित हैं लेकिन आपने कभी गंभीरता से सोचा कि मेमना खाना कितना बेकार काम है? आइए, हम आपको बताते हैं।

यूएसडीए की खबर के मुताबिक वर्ष 2015 में 22 लाख मेमने खाने के लिए मारे गए। गाय, सूअर और मुर्गे-मुर्गियों की तरह मेमनों को भी गंदे फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर क़ैद रखा जाता है, जहाँ वे क्रूर अंगभंग और नृशंस हत्या के शिकार बनते हैं।

प्रायः, जन्म के महज कुछ ही हफ़्तों बाद मेमनों के पूँछ कतर दिए जाते हैं। किसान दावा करते हैं कि ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि पशु के पिछले भाग में मल जमा न हो। लेकिन यह क्रूर और दर्दनाक अंगभंग, पशुओं को बिना बेहोश किए ही किया जाता है, जिसके कारण इन निरीह पशुओं को बहुधा संक्रमण, दीर्घकालिक पीड़ा और गुदा-भ्रंश (रेक्टल प्रोलेप्स) का शिकार होना पड़ता है।

केवल छः से आठ महीने की उम्र में ही निर्दयतापूर्वक क़त्ल किए जाने से पहले मेमने अपने प्राकृतिक जीवन काल का महज एक छोटा सा हिस्सा ही जी पाते हैं। मादा भेड़ बहुत ही ज़्यादा ध्यान रखने वाली होती हैं और वे अपने बच्चों से बहुत ही मजबूत संबंध रखती हैं। वास्तव में, वे दूर चर रहे अपने मेमनों को भी उनके मिमियाने की आवाज़ भर से पहचान सकती हैं। दुःखद है कि यह घनिष्ठ संबंध फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर असमय टूट जाता है, जहाँं जन्म के सिर्फ़ कुछ ही दिनों बाद माताओं से उनके मेमने को छीन लिया जाता है।

मेमने सिर्फ़ मासूम और भोले ही नहीं होते बल्कि वे अत्यंत चतुर भी होते हैं। वे समस्यायों को सुलझाने का सामर्थ्य रखते हैं और इनकी बुद्धिलब्धि (आईक्यू) अपने हमउम्र बछरों के समान होती है। उनकी स्मरण-शक्ति भी बहुत अच्छी होती है। मेमने कम से कम पचास अलग-अलग भेड़ों को साल भर के लिए याद रख सकते हैं! उच्चतर विकसित संवाद क्षमता के द्वारा, मेमने आवाज़ में बनावट के द्वारा अलग-अलग भावनाओं को व्यक्त कर सकते हैं। वे मुख-मुद्रा के द्वारा भी अपनी भावनाओं को प्रकट कर सकते हैं।

कोई कैसे इस प्रियकर जीव को प्यार करने का दावा कर सकता है जबकि उसे इन्हें खाने से परहेज नहीं है?

पशु-अत्याचार का विरोध करने वाले अनेक लोग शायद इस विचार से चिपक जाते हैं कि मांसाहार जरूरी है। लेकिन विज्ञान ने बिल्कुल साफ़ कर दिया है कि हम निरामिष या पशु-उत्पाद रहित आहार के बल पर कहीं अधिक स्वस्थ और प्रसन्न जीवन जी सकते हैं।

समय आ गया है कि हम अपने नैतिक-मूल्यों को खाने की मेज़ पर लाएँ और मेमने एवं अन्य पशुओं को खाना बंद करें। वनस्पतिक आहार अपनाकर हम दया एवं करुणा जैसे मानवीय मूल्यों को जी सकते हैं।

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