मांसाहारी करते हैं दोगुने ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन
मांस की खपत के पर्यावरणीय प्रभाव दूरगामी और अच्छी तरह से प्रलेखित रहे हैं, वहीं पर्यावरण के बारे में परवाह है, जो कई लोगों को अभी भी खाने के लिए जानवरों की परवरिश तो अविश्वसनीय रूप से विनाशकारी है कि पता नहीं है। मांस की खपत के पर्यावरणीय प्रभाव दूरगामी और अच्छी तरह से प्रलेखित रहे हैं। किन्तु पर्यावरण की चिन्ता करने वाले कई लोग अभी भी नहीं जानते कि जानवरों को खाने के लिए पालना (animal farming) अविश्वसनीय रूप से विनाशकारी है।

फ़ाउनालिटिक्स ( Faunalytics) द्वारा साझा एक नए अध्ययन से मांसाहारी, मतस्याहारी, शाकाहारी और पूर्ण-शाकाहारी (vegan) के बीच ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में अंतर का अनुमान प्रस्तुत किया गया है।

परिणाम में पाया गया कि एक मांसाहारी भोजना शाकाहारी भोजन की तुलना में दोगुना ग्रीन हाउस गैसों का उत्पादन करता है।

मांसाहारी पुरुष सर्वाधिक आहारजनित ग्रीन-हाउस गैस (डायटरी जीएचजी) उत्पादन करते पाए गए वहीं पूर्णतः शाकाहारी (vegan) महिलाओं में यह सबसे कम था। कुल मिलाकर एक शाकाहारी और मतस्याहारी आहार ग्रीन-हाउस गैस की लगभग समान मात्रा का उत्पादन करते हैं जो कि मांसाहारी आहार की तुलना में करीब पचास प्रतिशत कम है। किन्तु पूर्ण शाकाहारीआहारों में ग्रीन-हाउस गैस उत्सर्जन की मात्रा दुगुनी घट जाती है।

पूर्ण शाकाहारी (vegan) होते ही कार्बन डाय आक्साइड उत्सर्जन की मात्रा आधी घट जाती है। लेकिन इतना ही काफ़ी नहीं है। जरा इन तथ्यों पर भी विचार कीजिए :

सिर्फ़ एक पौंड गोमांस के उत्पादन के लिए लगभग 2500 गैलन (करीब ९५०० लीटर) पानी लग जाता है।

अमेज़न प्रदेश के जंगलों की अस्सी फ़िसदी कटाई (खाने के लिए) मवेशी पालन के लिए किया जाता है। फ़ैक्ट्री-फ़ार्मिंग (खाने के लिए मांस का उत्पादन) नदियों और भूमिगत जल को निहायत ही दूषित करता है। जलवायु परिवर्तन पर दुष्प्रभाव के अलावे, बड़े-बड़े फ़ार्मों में कैद जानवरों को अक्सर बिना किसी दर्द-निवारक के अंग-भंग किया जाता है और अनेक असहनीय पीड़ा दी जाती है। जैव-उत्पादों को ना कह कर हम पशुओं और अपनी धरती के हित में स्वस्थ, मानवोचित विकल्प अपना सकते हैं।

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