लुप्तप्राय ऑर्का में गर्भधारण के 69 प्रतिशत मामले असफल ... दोष किसका?
2005 में लुप्तप्राय घोषित होने के बाद, दक्षिणक्षेत्रीय ओर्का (एक प्रकार का व्हेल) की आबादी में बहुत कमी आयी है। वास्तव में व्हेल की इस प्रजाति में गर्भधारण के दो-तिहाई से अधिक मामले असफल हो रहे हैं। एक नए अध्ययन से पता चलता है कि मनुष्यों की गतिविधियों की वजह से ओर्का (व्हेल) भूख से मर रहे हैं।

अध्ययन में पता चला है कि डब्बे के ​​शोर और विषाक्त पदार्थों की उपलब्धता और चिनूक (राजा) सैल्मन जैसे पसंदीदा शिकार की कमी, ऑर्का आबादी की गिरावट का मुख्य कारण है।

चिनूक सैल्मन, जो लगभग 80 प्रतिशत व्हेल्स आहार का स्रोत है, स्वयं तेजी से लुप्त हो रहा है। 2015 में समुद्री मछली, चिनेकु सैल्मन को अत्यधिक पकड़े गये प्रजातियों की सूची में शामिल किया गया था। राष्ट्रीय समुद्री और वायुमंडलीय प्रशासन ने 2013 में एक रिपोर्ट प्रकाशित करते हुए दक्षिणी समुद्रवासी ओर्का प्रजाति के व्हेल पर सैल्मन मछली की विलुप्ति से पड़ने वाले प्रभावों का उल्लेख किया था। यद्यपि रिपोर्ट में दीर्घ अवधि प्रभाव के बारे में अनिश्चितता व्यक्त की गई थी, लेकिन इसमें कहा गया था कि सैल्मन मछली पकड़ने पर प्रतिबंध या इसे कम करने से तत्काल सकारात्मक प्रभाव पड़ेगा।

दिसंबर 2016 तक, दक्षिणी निवासी ओर्का आबादी में केवल 78 बचे थे, इसलिए महज एक गर्भावस्था का नुकसान भी विनाशकारी है। यह एक ऐसी प्रजाति है, जो दुनिया भर के महासागरों में हमारे शोषण के प्रभाव से पीड़ित है।

महासागर अत्यंत जटिल पारिस्थितिक तंत्र हैं, इसलिए जब एक प्रजाति की आबादी में गिरावट आती हैं, दूसरों को पीड़ित होना पड़ता है। उदाहरण के लिए, शेटलैंड द्वीप पर अटलांटिक पिफिन जीवित रहने के लिए सैंड-ईल्स पर निर्भर करते हैं। जैसे ही सैंड-ईल्स खत्म हुए, तो पिफिन संख्या भी नाटकीय रूप से घटने लगी। जब मनुष्यों द्वारा बड़े पैमाने पर हिलसा (हेरिंग) का शिकार किया जाता है, तो कॉड की आबादी गिरने लगती है। अत्यधिक मतस्यहरण के कारण कई मछलियों की प्रजातियाँ और और भोजन के लिये उन पर निर्भर करने वाले अन्य जीवों की प्रजातियाँ या तो विलुप्त हो गयी है या खतरे में है।

हम सभी समुद्री जानवरों के लिए सबसे अच्छी बात यह कर सकते हैं कि उनका शोषण करने वाले उद्योग का समर्थन करने से इंकार करें। मतस्य उद्योग लगातार प्रकृति के पारिस्थितिकी प्रणालियों के संतुलन को बाधित कर अनेक प्रजातियों को विलुप्त होने के जोखिम में डालता है। तो आज ही अपनी थाली से मछली एवं अन्य पशु-उत्पादों को हटाकर एवं दयापूर्ण वनस्पतिक आहार शैली अपना कर इस क्रूर एवं आसुरिक मतस्य उद्योग को वित्तिय समर्थन करने से बच सकते हैं।

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