रक्षक बने भक्षक! केयरटेकर्स ने मार खाए गोद लिए गए सूअर।
एक विडियो इंटरनेट पर तहलका मचा रहा जिसमें दिखाया गया है कि वेंकुवर में एक दम्पति, बीसी एसपीसीए से गोद लिए सूअर को मारकर खा जाते हैं। उनकी दलील यह है कि वे इस सूअर की देख-भाल करने में असमर्थ थे।

तीन वर्षीय वियतनामी नस्ल का सूअर मोल्ली को एक क्रूरता परीक्षण के बाद एसपीसीए के कोवचन पशु-आश्रम में पहुँचाया गया था। आश्रम के कर्मचारियों के मुताबिक, उसकी चिकित्सा के उपरान्त पिछले महीने ही उसे गोद लेने की प्रक्रिया पूरी हुई थी। दुःखद है कि महज कुछ हफ़्तों में ही उसकी हत्या कर दी गयी।

वैंकुवर निवासी और सहकर्मी सूअर अभिभावक ब्रान्डी मैकी ने पता लगाया कि उनके दोस्तों ने मोल्ली के साथ क्या किया था। मैकी ने दावा किया है कि आरोपित दम्पति सूअर की वास्तविक देख-भाल करना नहीं जानते थे और उन्होंने उसके पुनर्वास के बदले उसको मार कर खाने का निर्णय लिया। जायज रूप से आक्रोशित मैकी कहती हैं कि यदि यह कुत्ता या बिल्ली होता तो उन्हें अभियोग का सामना करना पड़ता।

दुर्भाग्यवश कनाडा के कानून में पशुओं को संपत्ति समझा जाता है अतः अपने साथ रहने वाले पशुओं को मारना पूरी तरह से वैध है।

बचाकर परिवार में लाए गए सूअर को महज चंद हफ़्तों में मारकर खा जाना बहुत ही दुःखद है। लेकिन इस से भी दुःखद यह है कि कनाडा एवं संयुक्त राज्य अमेरिका में किसी और का भोजन बनने के लिए हर साल करोड़ों सूअरों को दुर्दान्त मौत का सामना करना पड़ता है।

सूअर अत्यंत बुद्धिमान होते हैं। वास्त्व में, उन्हें इस पृथ्वी पर पाँचवाँ सबसे बुद्धिमान प्राणी समझा जाता है। यहाँ तक कि ये कुत्तों से भी ज़्यादा समझदार होते हैं। कुत्ते और बिल्लियों की तरह सूअर भी मिलनसार, सामाजिक और चंचल होते हैं। इसके बावजूद मांस उद्योग सूअरों के साथ महज एक वस्तु की तरह व्यवहार करता है।

खाने के लिए पाले जाने वाले सूअरों को जन्म के महज दस दिनों के अन्दर ही उनकी माँओं से अलग कर दिया जाता है, उनकी पूँछ काट दी जाती है, दाँत तोड़ दिए जाते हैं और उनका अंडकोष निकाल दिया जाता है, बिना कोई दर्दनिवारक दवा दिए। बीमार अथवा तेजी से नहीं बढ़ने वाले सूअर शावकों को बड़ी ही निर्दयता से फ़र्श पर सर के बल पटककर मार दिया जाता है या ठसाठस भरे गैस-कार्ट में फ़ेंक दिया जाता है, जहाँ वे कार्बन डाय-आक्सायड में घुट-घुट कर मर जाते हैं। बचे हुए सूअरों को गंदे बेरे में ठूस कर रखा जाता है।


सूअरों की प्राकृतिक आयु लगभग पन्द्रह वर्ष होती है, लेकिन फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर इन्हें इस प्रकार तेजी से बढ़ने के लिए नस्लीकृत किया जाता है कि महज छः महीने में ही वे बेचारे मारे जाने लायक बन जाते हैं। सूअरियों को धातुओं के बने तंग और गंदे पिंजरों में रहना पड़ता है, जहाँ वे मुश्किल से मुड़ भी इन्हें बारम्बार गर्भधारण और प्रजनन के दुश्चक्र से गुजरना पड़ता है।


यातनाओं से भरे छोटे से जीवन के बाद सूअरों को उल्टा लटका कर और गला काट कर नृशंसतापूर्वक मार दिया जाता है।


मोल्ली की तरह ही फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर आने वाले सभी सूअर दयालू, संवेदनशील एवं बुद्धिमान होते हैं। वे भी जीना और आज़ाद रहना चाहते हैं। कितना विचित्र विरोधाभास है कि हम एक पशु से प्यार करते हैं और एक दूसरे पशु को खाते हैं।

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