मांस के लिये सूअरों पर होने वाली पीड़ा पर शोध के बाद कैम्ब्रिज प्रोफ़ेसर बनी शाकाहारी
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता डॉ. पिआ स्प्री मैरकस ने हाल ही में द इंडिपेन्डेन्ट से कहा कि किस प्रकार उन्होंने पोर्क उद्योग के बारे में जानने के बाद पूर्ण शाकाहारी होने का निर्णय लिया।

अनेक लोगों की तरह डॉ. स्प्री मैरकस भी मांसाहार करते हुए बड़ी हुई थी। लेकिन सूअर/सूअर के मांस, पुरातत्व एवं जीव-विज्ञान, खाद्येयता पर शोध के दौरान वे सूअर के मांस से बनने वाले व्यंजनों को एक किताब में समेटना चाहती थी। इसी क्रम में उन्हें फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर सूअरों पर होने वाले बर्बर अत्याचार के बारे में जानने का मौका मिला।

घटना को याद करते हुए वे द इंडिपेन्डेन्ट से कहती हैं:

मेरा बेटा तीन साल पहले पैदा हुआ था और मैं उसकी देख-भाल कर रही थी। लोग मुझे मेरे बच्चे को दूध पिलाते हुए देखकर हँसते थे लेकिन फिर भी उनके लिये गाय के दूध में कॉफी पीना या चाकलेट स्प्रेड खाना ठीक था।

मैंने सोचना शुरु किया कि गाय का दूध पीना कितना अजीब हैI मैं किताब लिख रही थी और फ़ैक्ट्री फ़ार्मों एवं सूअरों द्वारा सूअर-सावकों के लालन-पालन पर शोध कर रही थी। उफ़… यही काफ़ी था। मैंने फ़ैसला किया कि अब बस कल से ही मैं पूर्ण शाकाहारी बन जाउंगी।

उन्होंने महसूस किया था कि किस प्रकार मनुष्यों को दूसरे जीवों की पीड़ा से कोई मतलब नहीं होता और किस प्रकार हम एक जानवार से प्यार करते हैं और दूसरे को खाते हैं। हम एक अदृश्य विश्वास तंत्र से नियंत्रित होते हैं जो हमें मांस खाने के लिये प्रेरित करता है। यह प्रवृत्ति सभी मांसाहारी समुदायों में सामान्य है।

डॉ. स्प्री मैरकस तो कहती हैं कि मांसाहार मनुष्यों का अंतर्निहित गुण नहीं है।। मांस, डेयरी और अंडे खाना प्राकृतिक या आवश्यक नहीं है। लेकिन हम ऐसा कर के पशुओं को हानि पहुँचा रहे हैं।

खाने के लिये पाले जाने वाले सूअर, गाय, मुर्गे और मछलियाँ फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर घोर पीड़ा का शिकार होते हैं। प्रिवेंशन आफ़ क्रुएल्टि ऑन एनिमल एक्ट 1960 और पशुओं के परिवहन और आवास के संबध में नियम हैं, लेकिन कठोर सजा के अभाव में इस प्रकार के दुरुपयोग होते रहते हैं।

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