गर्मी से पिघल रहा है आर्कटिक का बर्फ़ ! बैठे मत रहिए, कुछ कीजिए!!
पिछले दिनों अनेक पर्यावरनविदों ने आर्कटिक क्षेत्र में असामान्य रूप से बढ़ रहे तापमान और इन क्षेत्रों में रिकार्ड स्तर पर न्यूनतम हिम-सिन्धु के प्रति चिन्ता जतायी थी।

शरद ऋतु के चरम पर भी इस क्षेत्र का तापमान इतना ऊँचा था जितना अमूमन मई के महीने में होता है। मौसम वैज्ञानिक एरिक हाल्थस ने ट्वीट कर कहा है कि विश्व का सबसे उत्तरी उत्तरी छोड़ पर स्थित स्थायी जलवायु स्टेशन, जो कि उत्तरी ध्रुव से मात्र 440 मील दूर है, पिछले दिनों महीने भर के धुंध के बीच जो आम तौर पर साल का सबसे ठंडा महीना हुआ करता है, वहाँ 43° फ़ारेनहाईट तापमान दर्ज़ किया गया।

यह रिकार्ड गर्मी पहले से ही खतरनाक रूप से न्यूनतम स्तर पहुँचे हिम-सिन्धु को और अधिक पिघला रहा है। लुप्त होते बर्फ़ के कारण तटीय प्रदेशों में भयानक तूफ़ान का जोखिम बढ़ गया है जिससे इन क्षेत्रों के वन्य-जीवन के लिए खतरा उत्पन्न हो रहा है। ध्रुवीय ऋक्ष, प्रशांत-क्षेत्रीय दरियाई घोड़ा और आर्कटिक लोमड़ी जैसे जीव अपने भोजन के लिए बर्फ़ पर निर्भर करते हैं।

पिछले वर्ष, संरक्षण समूह सी-लेगेसी के फोटोग्राफ़र पॉल निक्लेन द्वारा लिया गया भूख से मर रहे एक ध्रुवीय ऋक्ष के मरने का हृदयविदारक वीडियो बाहर आया था। विडियों में दिखाया गया था कि किस प्रकार एक दुर्बल ऋक्ष अपना जीवन बचाने के लिए बर्फ़रहित जमीन से चिपका हुआ था, उसके मुँह से झाग निकल रहा था और वह बेचारा अपनी आँखें खोलने के लिए भी संघर्ष कर रहा था। भोजन की खोज में वह मछुआरों द्वारा कचरे में फेंके गए डिब्बों को खोल-खोल कर देखता है और अंत में निढ़ाल होकर जमीन पर गिर जाता है। जैसे-जैसे बर्फ़ की परत घटती जा रही है, ध्रुवीय ऋक्षों की भूखमरी भी बढ़ती जा रही है और इस प्रकार से इनकी पूरी आबादी पर समाप्ति का खतरा मँडरा रहा है।

लेकिन हम सब के पास इसके लिए कुछ करने की क्षमता है।

हमारे आहार से सभी पशु-उत्पादों का परित्याग कर हम अपने कार्बन उत्पादन में आधे की कटौती कर सकते हैं। सेन्टर फॉर बायोलॉजिकल डायवर्सिटी के अनुसार मांस-उत्पादन के द्वारा दुनियाँ में सर्वाधिक कार्बन-उत्सर्जन किया जाता है। ध्रुवीय ऋक्षों के अस्तित्व पर चुनौती है कि वे इस सदी का अंत देख पायेंगे या नहीं।

वास्तव में, नेशनल रिसोर्स डिफ़ेन्स कौन्सिल के अनुसार, पर्यावरण को हानि पहुँचाने वाले पाँच अग्रणी खाद्य पदार्थों में सारे के सारे पशु उत्पाद हैं, गोमांस, मक्खन, शेल-मछली और पनीर।


इससे भी अधिक, दुनियाँ भर के सभी परिवहन माध्यमों को एक साथ मिलाकर भी जितना ग्रीन-हाउस गैसा का उत्सर्जन होता है उससे कहीं अधिक ग्रीन-हाउस गैस का उत्सर्जन सिर्फ़ खाद्य-पशुपालन के द्वारा होता है। एक पाउंड सोया के मुकाबले एक पाउंड गोमांस के लिए 13 प्रतिशत अधिक जीवाश्म ईंधन और 15गुणा अधिक पानी लगता है। आमेजन वर्षा वनों के 91 प्रतिशत विनाश के लिए सिर्फ़ पशु कृषि जिम्मेदार है और अब तक पशु-कृषि एक तिहाई भू-भाग पर फ़ैल चुका है, जिसके फलस्वरूप वहाँ के प्राकृतिक निवासियों को निर्वासन का सामना करना पड़ रहा है।

आर्कटिक के रेकार्डतोड़ तापमान को एक जागरण का संकेत समझना चाहिए। समय आ गया है कि हम इस समस्या को गंभीरता से लें और इस बात को चिन्हित करें कि जो भोजन हम खाते हैं वह हमारे पर्यावरण को कुप्रभावित कर रहा है। आप पर्यावरण को नुकसान पहुँचाए बिना पशु-उत्पाद का भक्षण नहीं कर सकते। सीधे शब्दों में कहें तो आप मांस खाकर पर्यावरण के रक्षक नहीं बन सकते। बस।

लेकिन एक वनस्पतिक आहार न केवल पर्यावरण के लिए बेहतर है बल्कि यह अनगिनत प्राणियों को फ़ैक्ट्री-फ़ार्मों पर आजीवन मिलने वाली घोर पीड़ा से भी बचाता है। सूअर, गाय, मुर्गे-मुर्गियों एवं अन्य फ़ार्म्ड-पशुओं को भयानक यातनाओं से गुजरना पड़ता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक इन निरीह पशुओं का जीवन नारकीय होता है। उन्हें कठोर क़ैद, काटे एवं ज़िन्दा जलाए जाने और नृशंस हत्या का सामना करना पड़ता है।


जिस प्रकार इसमें कोई दो राय नहीं कि जलवायु-परिवर्तन एक सत्य है, इस बात में भी कोई दो राय नहीं कि पशु-कृषि इसका अग्रणी कारक है। जुड़िए उन लाख लोगों से वनस्पतिक आहार अपनाकर पर्यावरण को बचाने में अपना योगदान दे रहे हैं। शुरु करने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए।
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