स्वीडन में मांस का उपभोग तीस साल के सबसे नीचले स्तर पर
स्वीडिश बोर्ड ऑफ एग्रीकल्चर की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले साल, स्वीडन में मांस का उपभोग 2.6 प्रतिशत या पाँच पाउंड प्रति-व्यक्ति की दर से गिरा है।

2.4 पाउंड प्रति-व्यक्ति की दर से सबसे ज़्यादा गिरावट गोमांस के भक्षण में आयी है। इसके बाद सूअर के मांस और फिर पोल्ट्री-उत्पादों का नंबर आता है।

स्वीडिश बोर्ड ऑफ एग्रीकल्चर की प्रवक्ता असा लैन्हर्ड ओबर्ग ने एक कथन में कहा है कि मांसों के उपभोग में गिरावट की अनेक व्याख्या है, लेकिन शाकाहार का प्रचलन, जलवायु-परिवर्तन पर परिचर्चा, स्वास्थ्य एवं नैतिक कारणों के चर्चे कम हैं।

आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि अपने मैकवीगन सैंडविच की टेस्टिंग के लिए मैक्डोनाल्ड ने दो देशों में एक स्वीडन को चुना। फुडनेविगेटर के अनुसार, स्वीडन एवं फ़िनलैण्ड के ठिकानों पर इस फ़ास्टफुड महारथी ने पहले ही महीने में 150,000 मैकवीगन्स बेचे। वनस्पति आधारित बर्गर इतना हिट रहा कि मैकडोनाल्ड ने इसे अपने मेनु में स्थायी तौर पर शामिल कर लिया है।

लेकिन मांसाहार सिर्फ़ स्वीडन में ही कम नहीं हो रहा है। पिछले साल ब्लुमबर्ग ने खबर दी थी कि जर्मनी में भी पशु-उत्पादों की तुलना में वनस्पतिक विकल्पों का चयन बढ़ रहा है। वास्तव में, जर्मनी लोकप्रिय शाकाहारी स्थल के रूप में तेजी से उभर रहा है। 2008 से 2011 के आँकड़ों पर आधारित 2016 में प्रकाशित एक अध्ययन में अनुमानतः अठारह से उन्नासी वर्ष के 4.3 प्रतिशत जर्मन नागरिकों को बतौर शाकाहारी चिन्हित किया गया था। इनमें भी सबसे बड़ी संख्या अठारह से उनतीस वर्ष के लोगों की थी। यह आँकड़ा इंगलैण्ड के दो प्रतिशत और संयुक्त राज्य अमेरिका के 3.3 प्रतिशत से कहीं ज़्यादा है।

पिछले दशक में वनस्पतिक आहार शैली में निरंतर वृद्धि देखी गयी है शायद इसलिए कि नयी पिढ़ी अपना भोजन स्वयं खरीद रही है। न्यूयार्क टायम्स के अनुसार, “अपने स्वास्थ्य, पर्यावरण एवं पशुओं की कुशलता के प्रति अधिक जागरुक यह पीढ़ी औरों के मुकाबले कहीं अधिक, स्वयं को शाकाहारी के रूप में प्रस्थापित कर रही है।”

मांसाहार में कमी, फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर घोर पीड़ा का शिकार हो रहे अरबों पशुओं के लिए एक शुभ समाचार है। खाने के लिए पाले और मारे जाने वाले गाय, सूअर और मुर्गे-मुर्गियाँ हमारे कुत्ते और बिल्लियों की तरह ही समझदार एवं संवेदनशील होते हैं। लेकिन फ़ैक्ट्री फ़ार्मों पर उन्हें अकल्पनीय अत्याचार, कठोर क़ैद, बर्बर अंगभंग एवं नृशंस हत्या का शिकार होना पड़ता है।

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