देखिये, दूध नहीं देने वाली गायों के साथ फ़ार्मों पर क्या किया जाता है
सभी स्तनधारियों की तरह, गायें अपने बच्चों के पोषण के लिये दूध देती हैं। इस तरह से यह स्पष्ट है कि दूध देने के लिये गायों को वास्तव में गर्भधारण और प्रजनन करना पड़ता है।

डेयरी फ़ार्मों पर बेचारी गायों को अपने बच्चों को दूध पिलाकर पालने का मौका कभी नहीं मिलता। इसके विपरीत, उनके नवजातबछड़े उनसे चुरा अथवा छीन लिये जाते हैं ताकि किसान उन नवजात बच्चों की मां का दूध बेच सकें।

दूध का उत्पादन करने के लिए, गायों को जबरन गर्भधारण, प्रसव और दुग्ध-दोहन के वार्षिक कुचक्र में फ़ँसाकर रखा जाता है। उनकी बेटियों (बछरियों) को उनके सामने ही घसीटकर दूर ले जाया जाता है और फिर उनका भी हाल उनकी माँ की तरह ही होता है, गर्भधाराण, प्रसव की पीड़ा, बच्चे का त्याग, बस दूध देते रहो। और बछड़ों को छोटे बक्से में महज कुछ दिनों की मजबूर ज़िन्दगी और फिर निर्मम तरीके से काट कर मांस के टुकड़े बना दिये जाते हैं।

गोमाताओं का संकट बेसूमार है। कई बार तो ये बेचारी गायें उन किसानों का पीछा करती रहती हैं, जो उनके बच्चों को घसीट कर ले जाते हैं। वे अपने लापता बच्चों के लिए कई दिन या हफ्तों तक रोती और विलाप करती रहती है।

आनुवंशिकता एवं हार्मोन को प्रभावित करने वाली (प्रतिबंधित) दवाओं के बल पर असामान्य रूप से अधिक मात्रा में दूध देने के कारण चार या पांच साल के बाद इन गायों का दूध सूख जाता है। "उनका शरीर जवाब देने लगता है और वे अपेक्षित मात्रा में दध नहीं दे पाती। कई गायें स्तनों के दर्दनाक संक्रमण (मेस्टाइटिस) से ग्रस्त होती हैं और कई तो इतनी कमजोर हो जाती हैं कि खड़े होने में भी असमर्थता महसूस करती हैं।

यहां देखिये डेयरी उद्योग लंगड़ी गायों को कैसे ले जाता है:


तो उन गायों के साथ क्या होता है जो पर्याप्त दूध नहीं दे पाती?

उन्हें बेरहमी से मार दिया जाता है।

दूध नहीं तो पैसे नहीं। फिर किसानों के लिये इन गायों का कुछ मतलब नहीं रह जाता। गायों के बच्चे को उनसे चुरा लिया जाता है। और बेचारी गायें भी अपने पूर्ण जीवन-काल जो कि बीस से पच्चीस वर्षों तक हो सकता है, उसका महज एक छोटा अंश ही जी पाती हैं और फिर उन्हें निष्ठुरता के साथ कसाईखानों में भेज दिया जाता है जहाँ वे हिंसक मौत का शिकार होकर गोमांस बन जाती हैं। जी हाँ, हर हम्बर्गर के अंदर अमेरिका के डेयरी के गायों के अवशेष हैं।

सौभाग्य से, डेयरी गिरावट पर है। 1970 के दशक के बाद से संयुक्त राज्य अमेरिका में दूध की खपत में 40% कीकमी आई है, जबकि मानवीय और स्वादिष्ट वनस्पतिक दूध की खपत बढ़ गई है। सिर्फ दूध ही नहीं; वनस्पति से प्राप्त पनीर, मक्खन, आइसक्रीम, और अन्य वनस्पतिक उत्पाद डेयरीउत्पादों के मुकाबले हाल के वर्षों में और भी लोकप्रिय हुए हैं।

लोग डेयरी उद्योग की क्रूर सच्चाई को समझने लगे हैं और यह जानवरों के लिए अच्छी खबर है। लाखों लोग डेयरी और अन्य क्रूर पशु उत्पादों को अपनी प्लेटों से हटाकर करुणामय वनस्पतिक उत्पादों को अपना रहे हैं। आप भी उनलोगों में शामिल होना चाहते हैं? निःशुल्क शाकाहारी व्यंजनों और शुद्ध भोजन योजनाओं पर परामर्श के लिये यहाँ क्लिक कीजिये।
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